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Thursday, May 20, 2010

अधमों को भी अधम बना दे

देखा एक दृश्य अलबेला , मैंने श्मशान के ढाल में
काक मांस को पका रही चांडालिनि, मनुज कपाल में
बना लिया था शव अवयवों को , वैकल्पिक ईंधन का रूप
सहसा उलझा प्रश्न एक तब , मेरे वैचारिक जाल में

हे चांडालिनि ! परम अधम तू , और भूमि अवशिष्ट यह
परम हेय है पात्र तुम्हारा , काग मांस भी अति निकृष्ट है
शव के अवयव बने हैं ईंधन , फिर भी पात्र ढका क्यों है
इन अधमों को भी अधम बना दे , ऐसा क्या अपविष्ट है

वह चांडालिनि हँसी और फिर , बोली मुझसे " हे ! 'जय ' जी ,
सत्य कहा , मैं अधम नारि हूँ , यह स्थान भी त्याज्य सही
ईंधन, पात्र अधम है भोजन , फिर भी ढका पात्र इस कर
कोई राष्ट्रद्रोही आ जाये , तो पड़ न जाए पद धूलि कहीं

Wednesday, May 19, 2010

खुदारा ! अब नचा हूँ मैं ......

तुम्हारी आँख के आँसू मुझे अच्छे नहीं लगते
दिवानों की तरह बहते मुझे सच्चे नहीं लगते
जो कहना हो तुम्हे ,खुलकर वो बातें आज कह भी दो
सताने के लिये ही क्या तुम्हे बच्चे हमीं दिखते

हमारे घर में आयी है तुम्हारे राह की खुशबू
तभी से है झगडती यह मेरी धड़कन खुद ही हमसू
ये कहती है चलूँ बाहर जाकर के तुम्हे लाऊँ
ये नाहक हो रही पागल तुम्हे आना इधर ही कू

हमारे गीत की पंक्ति कभी तो गुनगुनाओगे
मेरा वादा है तुम पढ़कर स्वयं ही मुस्कुराओगे
रहोगे दूर तुम कितना अभी यह देखना बाकी
हृदय यह कहता है मुझसे मुझे तुम अब बुलाओगे

मेरी आँखों में जो सपने हैं उनका क्या करेंगे हम
तुम्हारे दिल की राहों में भला कैसे चलेंगे हम
जहां पर एक दरवाजा था मेरे आने जाने का
वहीं पर तो दिवारे हैं नहीं अब मिल सकेंगे हम

मेरी साँसों में डालो जी ज़रा सी अपनी साँसे भी
बहुत दिन के चले हैं हम अभी भूखे हैं प्यासे भी
तुम्हारी चन्द साँसे ही मुझे जीवन नया देंगीं
यही तो मीठी मिश्री हैं , मावा हैं , बताशे हैं

मुझे तो मार डालेगा तुम्हारी आँख का जादू
तुम्हे देखूँ तो बेचैनी बढे, बढ़कर हो बेकाबू
मैं टोंकू लाख धड़कन को मगर बनती सुनामी यह
संभालो मुझको यारो तुम कोई भैया , अरे बाबू

हमारे दिल में रहती हैं तुम्हारी ही घनी यादें
मुझे सब याद हैं अबतक तुम्हारी वो कही बातें
ज़रा मायूस हूँ लेकिन नहीं जीवन से मैं हारा
तुम्हे ही ढूंढती रहती ज़माने में मेरी आँखें

ये सोचा था ज़माने की निगाहों से बचा लूं मैं
तुम्हे नज़दीक पाकर मैं ज़माने से छिपा लूं मैं
ये मेरा था वहम खालिस कि ' जय ' तुम भोले भाले हो
ज़माने को नचाया है , खुदारा ! अब नचा हूँ मैं

Wednesday, May 12, 2010

दीप जलें तो दिल जलता है

दीप जलें तो दिल जलता है , रात ढले तो नयन हैं रोते /
स्मृतियों के घने मेघ अब , मेरे अंतर्मन को भिगोते //
मैं शिलाखंड सा मूढ़ मति , तुम अविरल प्रपात सी आ के मिली
सानिध्य मिला जब मुझे तुम्हारा , कालिमा मेरी सब बह निकली
मैं शुभ्र धवल और नवल हुआ , अथवा अपराध विहीन हुआ
कृमशः वह पत्थर क्षरित हुआ , और मूर्ति बनी उजली उजली
वो तुम ही हो जिसके कारण , पत्थर को सब नत हैं होते /
दीप जलें तो दिल जलता है , रात ढले तो नयन हैं रोते //
तुम अमर बेल सी मृदु लतिका , क्यों कीकर ही का चयन किया
उसके तीक्ष्ण दीर्घ कंटक , क्यों कोमल तन पर सहन किया
यद्यपि तुम हो बिना मूल की , किन्तु स्वयं आधार बन गयीं
मुझे सहेजा और संवारा , नव सुखद सुकोमल सृजन किया
वो तुम ही हो जिसके कारण , कांटे भी सम्मानित होते /
दीप जलें तो दिल जलता है , रात ढले तो नयन हैं रोते //
कुछ ही मधुमास व्यतीत हुए , तुम बनी हमारी मर्यादा
जीवन था कितना सौम्य सरल , सरस सजीवन सीधा सादा
भृकुटि तनी फिर क्रूर काल की , ध्वस्त हो गए स्वप्न सुहाने
नीव हिल गयी भव्य भवन की , बचा रहा ' जय ' खंडहर आधा
कभी क्षितिज तक भरी उड़ानें , आज उदधि में खाएं गोते /
दीप जलें तो दिल जलता है , रात ढले तो नयन हैं रोते //

Wednesday, May 5, 2010

तुम निशिगंधा सी महक गयी

मैं अमलतास सा बना रहा , तुम निशिगंधा सी महक गयी /
द्विविधावश मैं मूक रहा , तुम मुक्त कंठ से चहक गयी //
उच्च शिखर की चोटी से , अब हमें उतरना ही होगा /
आगत जीवन के लिए हमें , संकल्प बदलना ही होगा //
भावनाओं की ऊंची लहरों से ,हमको लड़ना भी होगा /
अब प्रचंड दैहिक तापों को . हमें शमन करना ही होगा //
मैं झंझावातों में उलझ गया , तुम दिन रहते ही समझ गयी /
मैं अमलतास सा बना रहा , तुम निशिगंधा सी महक गयी //
क्या बहती धाराओं में अब , कलकल संगीत नहीं है ?
मिलने पर गले लगाने की , क्या अब वह रीति नहीं है ?
सप्तपदी में बंधा पुरुष , क्या अब परिणीत नहीं है ?
व्यावसायिकता के जीवन में ,क्या रिश्ते अभिनीत नहीं हैं ?
मैं चिंतनपथ पर ठहर गया , तुम स्वप्नगली में बहक गयी /
द्विविधावश मैं मूक रहा , तुम मुक्त कंठ से चहक गयी //
तुम जब भी मेरे साथ रहो , क्यों लगे हम निर्जन में हैं ?
जब जीवन हम जीना चाहें , क्यों लगे कि हम उलझन में हैं ?
सम्मुख भी दृष्टि न डाले हम , क्या दोष युगल नयनन में है ?
क्यों शब्द सभी ' जय ' अकथ हुए , क्यों गतिरोध कथन में है ?
मैं जीवन की डोर सहेज रहा , क्यों पीड़ा बन तुम कसक गयी ?
मैं अमलतास सा बना रहा , तुम निशिगंधा सी महक गयी /
द्विविधावश मैं मूक रहा , तुम मुक्त कंठ से चहक गयी //