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Monday, January 25, 2010

नारी जीवन




( १ )


नारी के कितने जीवन हैं और कितनी परिभाषाएं हैं
नारी जीवन में तो केवल त्याग और अभिलाषाएं हैं

जनम लिया तो माता को मातृत्व का सुखद उपहार दिया
किन्तु कोख को कलुषित कह कर दादी ने तिरस्कार दिया

पिताश्री के मुख मंडल पर पीड़ा बन कर छाई हूँ
यूं लगे कि जैसे प्रलयंकारी स्थितियों को लाई हूँ

कलतक जो माँ थी पलकों पर आज नहीं कोई पूछने वाला
ताक रहे सब डरे डरे यूं सूंघ लिया ज्यों नाग ने काला

पिताश्री के कंधे पर सर रख माँ कल अंतिम बार हँसी थी
प्रसव की पीड़ा को भी उसने हंसी खुशी से सह ली थी

आज जननि का हृदय हो रहा है अगडित तानों से तार तार
दुःख से उबला रक्त और अब बह रही निरंतर अश्रुधार

उल्लासित स्वर ठिठक गए हैं मृतक हो गयी उत्सव चर्चा
स्वस्तिवचन मिल रहे मुझे अब , 'करमजली तू मर जा मर जा '

सुन्दर पल था गर्भ का जीवन किन्तु दुखद नव जीवन है
कोमल कोमल कोंपल का यह कैसा अद्भुद अभिनन्दन है