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Wednesday, January 27, 2010

नारी जीवन

( २ )
देखे हैं मधुमास अष्ट दस मैंने जीवन में अब तक
यौवन के स्पर्श से पुलकित हुए हैं मन और तन के ऊतक
दिव्य धार बह रही हृदय में अधरों पर है पावन गान
रोम रोम में सौम्य समर्पण नयन ढूंढते हैं भगवान्
तरुणाई से अब तक जितना समय विताया है मैंने
देहरी से बाहर जाने को जब कदम बढाया है मैंने
जन मिले मुझे सामान्य बहुत उत्तम और अपने जैसे
किन्तु अधिक है संख्या उनकी जो लगे हेय सपने जैसे
हेय कहूं या दुष्ट कहूं या कहूं मैं पापी अत्याचारी
कुत्सित कुटिल कीट नरभक्षी आततायी या फिर व्यभिचारी
रोम रोम छलनी करने को व्याकुल से बहु मित्र मिले
बड़ी आयु के मिले सयाने पातक तनभेदी दृष्टि लिए
व्यक्त करूँ मैं पीड़ा किससे मात पिता या भाई से
सभी डांट कर कह देते हैं " बैठो , रहो सिधाई से "
निर्बाध घूमते पातक हैं पर मुझे चतुर्दिक मिलते ताना
निरअपराधिन दंड को भोगूँ कैसा यह समाज का बाना

Monday, January 25, 2010

नारी जीवन




( १ )


नारी के कितने जीवन हैं और कितनी परिभाषाएं हैं
नारी जीवन में तो केवल त्याग और अभिलाषाएं हैं

जनम लिया तो माता को मातृत्व का सुखद उपहार दिया
किन्तु कोख को कलुषित कह कर दादी ने तिरस्कार दिया

पिताश्री के मुख मंडल पर पीड़ा बन कर छाई हूँ
यूं लगे कि जैसे प्रलयंकारी स्थितियों को लाई हूँ

कलतक जो माँ थी पलकों पर आज नहीं कोई पूछने वाला
ताक रहे सब डरे डरे यूं सूंघ लिया ज्यों नाग ने काला

पिताश्री के कंधे पर सर रख माँ कल अंतिम बार हँसी थी
प्रसव की पीड़ा को भी उसने हंसी खुशी से सह ली थी

आज जननि का हृदय हो रहा है अगडित तानों से तार तार
दुःख से उबला रक्त और अब बह रही निरंतर अश्रुधार

उल्लासित स्वर ठिठक गए हैं मृतक हो गयी उत्सव चर्चा
स्वस्तिवचन मिल रहे मुझे अब , 'करमजली तू मर जा मर जा '

सुन्दर पल था गर्भ का जीवन किन्तु दुखद नव जीवन है
कोमल कोमल कोंपल का यह कैसा अद्भुद अभिनन्दन है